VHSSS

चहके पंछी दिनकर कहता -‘मनलाभ’ के छंद

विषय – प्रभाती

आधार छंद — सार छंद

चहके पंछी दिनकर कहता, कितनी सुंदर माया।
रंग-बिरंगे चित्र उभरते, देखो नभ पर छाया।।
काली नभ अब नीली होती, पीली फिर नारंगी।
देख लालिमा ऐसी बिखरी, ज्यों होली हुड़दंगी।।
काली छाया लंबी होकर, होती जाती छोटी।
जिसने भी यह दृश्य न देखा, उसकी किस्मत खोटी।।
सृजन प्रकृति यह दिवास्वप्न है, मधुमय गीत सुनाते।
मधुकर मद में हुआ चूर है, सरस प्रसून   बुलाते।।
गाय चराने जाते जंगल, कुछ लोगों की टोली।
गाने गाते सिटी बजाते, सहज – सरल है बोली।।
काँधें पर हल रखकर चलते, देख कृषक मन भाता।
पगडण्डी की हरित घास भी, स्वागत को हर्षाता।।
कोण बदलकर ताव दिखाता, रंग सभी उड़ जाते।
श्वेत पुष्प अब आसमान में, खिलकर देख चिढ़ाते।।
कल – कल माया हरित पर्ण है, छाया अनुपम लागे।
कस्ती लेकर मछुवारे भी, काम – काज को भागे।।
हार न मानो स्वेद – रक्त से, पहर नया है प्यारे।
आयेगा वह अनुपम क्षण भी, मित्र मिलेंगे सारे।।
बैठ प्रतीक्षा कर लो थोड़ी, कर्म – धर्म सुखकारी।।
फिर बिखरेगा रंग मनोहर, काली मायाधारी।।
लेखक- लक्ष्मीकान्त वैष्णव ‘मनलाभ’
व्याख्याता (भौतिकी)
जिला – सक्ती (छत्तीसगढ़)
7610306500

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top